

गोडावण की वापसी: रेगिस्तान के खुले आकाश में जीवन की नई आशा
नफ़ीस आफरीदी
राजस्थान की पहचान केवल उसके किलों, महलों, मरुस्थल और रंग-बिरंगी संस्कृति से नहीं अपितु इसकी एक दूसरी पहचान उसकी समृद्ध जैव-विविधता भी है। थार के विशाल रेतीले विस्तार, घासभूमियाँ, ओरण, चरागाह और खुले प्राकृतिक क्षेत्र अनेक दुर्लभ जीव-जंतुओं और पक्षियों के आश्रय रहे हैं। इन्हीं में गोडावण का स्थान सबसे विशिष्ट है। राजस्थान का राजकीय पक्षी गोडावण, जिसे अंग्रेजी में ग्रेट इंडियन बस्टर्ड कहा जाता है, कभी थार के विस्तृत भूभाग में सहज दिखाई देने वाला पक्षी था। आज वही पक्षी दुनिया की अत्यंत संकटग्रस्त पक्षी प्रजातियों में शामिल है। उसके अस्तित्व का संकट केवल एक पक्षी के कम होते जाने का संकट नहीं है, बल्कि यह उस पूरे पारिस्थितिक तंत्र के संकट का संकेत है, जिसमें घासभूमियाँ, खुले रेगिस्तानी क्षेत्र और पारंपरिक चरागाह शामिल हैं। फिर भी गोडावण की कहानी निराशा पर समाप्त नहीं होती। पिछले लगभग तेरह वर्षों में राजस्थान में चले उसके संरक्षण प्रयासों ने इस पक्षी को विलुप्ति के कगार से वापस लाने की उम्मीद पैदा की है। संरक्षण-प्रजनन, कृत्रिम गर्भाधान, ‘जम्पस्टार्ट’ तकनीक, री-वाइल्डिंग और अब बंदी-प्रजनित पक्षियों को प्राकृतिक आवास में छोड़ने की प्रक्रिया इस अभियान को एक नए चरण में ले आई है।
राजस्थान में गोडावण संरक्षण की यात्रा को वर्ष 2013 से जोड़ना महत्वपूर्ण है। इसी वर्ष राजस्थान सरकार ने प्रोजेक्ट इंडियन ग्रेट बस्टर्ड की शुरुआत की थी। उस समय अशोक गहलोत राजस्थान के मुख्यमंत्री थे। परियोजना का मूल उद्देश्य गोडावण की बची हुई आबादी और उसके प्राकृतिक आवास को सुरक्षित करना था। जैसलमेर का डेजर्ट नेशनल पार्क और उसके आसपास का क्षेत्र इस अभियान का प्रमुख केंद्र बना। यह वह दौर था जब गोडावण की घटती संख्या को लेकर गंभीर चिंता सामने आ चुकी थी और यह लग रहा था कि सामान्य वन्यजीव संरक्षण उपाय पर्याप्त नहीं होंगे। गोडावण के लिए उसके प्राकृतिक आवास को बचाना जितना जरूरी था, उतना ही जरूरी उसकी घटती प्रजनन क्षमता और कम होती संख्या को देखते हुए वैज्ञानिक संरक्षण-प्रजनन की दिशा में आगे बढ़ना भी था। इस परियोजना ने आगे चलकर जिस बड़े वैज्ञानिक कार्यक्रम का रूप लिया, उसकी शुरुआती आधारभूमि इसी प्रयास में दिखाई देती है।गोडावण के संरक्षण की सबसे बड़ी कठिनाइयों में से एक उसका धीमा प्रजनन है। मादा सामान्यतः एक ही अंडा देती है। प्राकृतिक परिस्थितियों में अंडे और चूजे अनेक खतरों से घिरे रहते हैं। यदि किसी ऐसी प्रजाति की संख्या पहले ही बहुत कम हो जाए तो प्रत्येक अंडा और प्रत्येक चूजा अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। इसी कारण संरक्षण विशेषज्ञों ने ऐसी व्यवस्था विकसित करने पर जोर दिया जिसमें जंगल से प्राप्त अंडों को सुरक्षित वातावरण में सेया जाए और उनसे निकलने वाले चूजों को वैज्ञानिक निगरानी में बड़ा किया जाए। वर्ष 2016 में केंद्र सरकार के कैंपा कार्यक्रम के सहयोग से गोडावण के आवास सुधार और संरक्षण-प्रजनन की एकीकृत योजना को आगे बढ़ाया गया। इसके बाद जुलाई 2018 में केंद्र के पर्यावरण मंत्रालय, राजस्थान वन विभाग और भारतीय वन्यजीव संस्थान के बीच त्रिपक्षीय समझौता हुआ। इस समझौते ने गोडावण संरक्षण को अधिक संगठित और वैज्ञानिक आधार प्रदान किया। इसके बाद राजस्थान में संरक्षण-प्रजनन कार्यक्रम केवल एक वन्यजीव परियोजना नहीं रहा, बल्कि वैज्ञानिक अनुसंधान, प्रजनन, आवास सुधार और भविष्य में पुनःप्रकृति-स्थापन को जोड़ने वाला व्यापक कार्यक्रम बन गया।
जून 2019 में जैसलमेर के सम क्षेत्र में गोडावण का अस्थायी संरक्षण-प्रजनन केंद्र शुरू हुआ। जंगल से सुरक्षित तरीके से अंडे एकत्र किए गए और उन्हें नियंत्रित परिस्थितियों में सेया गया। उनसे निकलने वाले चूजों को वैज्ञानिक तरीके से पाला गया। देखने में यह काम केवल अंडे से चूजा निकालने जैसा लग सकता है, लेकिन वास्तव में इसके पीछे बहुत जटिल वैज्ञानिक प्रक्रिया है। चूजे को जीवित रखना ही पर्याप्त नहीं था। उसे इस तरह विकसित करना था कि भविष्य में वह प्राकृतिक वातावरण में स्वयं भोजन खोज सके, उड़ सके, मनुष्यों पर निर्भर न हो और गोडावण के स्वाभाविक व्यवहार को बनाए रख सके। इसी उद्देश्य से सम केंद्र में कई वर्षों तक लगातार प्रयोग और अध्ययन किए गए। इसके बाद रामदेवरा में स्थायी संरक्षण-प्रजनन केंद्र विकसित किया गया, जो अगस्त 2022 में कार्यशील हुआ। इस केंद्र ने आगे चलकर गोडावण संरक्षण की वैज्ञानिक प्रयोगशाला के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।इस परियोजना के सामने अगली बड़ी चुनौती यह थी कि संरक्षण केंद्रों में तैयार पक्षी स्वयं प्रजनन करने लगें। यदि हर बार जंगल से अंडे लाकर ही चूजे पैदा करने पड़ें तो संरक्षण-प्रजनन की क्षमता सीमित रहेगी। वर्ष 2023 में सम केंद्र में बंदी अवस्था में पले गोडावणों से प्राकृतिक प्रजनन के माध्यम से चूजा पैदा हुआ। यह उपलब्धि इस पूरे कार्यक्रम के लिए महत्वपूर्ण थी। इसका अर्थ था कि अब संरक्षण केंद्र में तैयार की गई आबादी स्वयं प्रजनन करने की दिशा में बढ़ रही थी। गोडावण जैसे अत्यंत दुर्लभ पक्षी के मामले में यह एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक उपलब्धि है, क्योंकि इससे भविष्य में संरक्षण केंद्रों में एक स्थायी प्रजनन आबादी विकसित करने की संभावना मजबूत हुई।
वैज्ञानिकों ने इसके साथ ही कृत्रिम गर्भाधान की तकनीक पर भी काम किया। वर्ष 2024 में कृत्रिम गर्भाधान के माध्यम से गोडावण का चूजा पैदा करने में सफलता मिली। यह उपलब्धि इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि गोडावणों की संख्या बहुत कम है और उपलब्ध प्रजननक्षम पक्षियों के बीच आनुवंशिक विविधता बनाए रखना संरक्षण का महत्वपूर्ण हिस्सा है। भविष्य में कृत्रिम गर्भाधान जैसी तकनीक सीमित संख्या में उपलब्ध नर-मादा पक्षियों से अधिक प्रभावी प्रजनन कराने तथा आनुवंशिक विविधता को सुरक्षित रखने में उपयोगी हो सकती है। इस तरह गोडावण संरक्षण अब केवल जंगल में पक्षियों की निगरानी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आधुनिक वन्यजीव विज्ञान की अनेक तकनीकों का प्रयोग भी इसमें शामिल हो गया। गोडावण संरक्षण में ‘जम्पस्टार्ट’ तकनीक भी एक महत्वपूर्ण प्रयोग के रूप में सामने आई है। इसमें जंगल से प्राप्त असुरक्षित अंडे को संरक्षण केंद्र में सुरक्षित तरीके से सेया जाता है और उसके स्थान पर संरक्षण केंद्र में तैयार किया गया अंडा रखा जाता है। जंगली मादा उस अंडे को स्वीकार करती है और उसे प्राकृतिक वातावरण में सेती है। इस प्रक्रिया से चूजे को संरक्षण केंद्र की वैज्ञानिक सुरक्षा का लाभ मिलता है और उसके जन्म तथा शुरुआती जीवन को प्राकृतिक वातावरण भी प्राप्त होता है। राजस्थान में इस प्रयोग से छह और गुजरात में दो चूजों के सफल जन्म की जानकारी सामने आई है। यह तकनीक इसलिए उल्लेखनीय है क्योंकि इसमें संरक्षण केंद्र की वैज्ञानिक क्षमता और जंगल की प्राकृतिक परिस्थितियों के बीच एक सेतु तैयार होता है। भविष्य में ऐसी तकनीकें गोडावण की जंगली आबादी को मजबूत करने में उपयोगी साबित हो सकती हैं।
गोडावण संरक्षण की इस पूरी यात्रा में वर्ष 2026 विशेष महत्व रखता है, क्योंकि अब परियोजना संरक्षण-प्रजनन से आगे बढ़कर ‘री-वाइल्डिंग’ के चरण में प्रवेश कर चुकी है। बंदी अवस्था में पले पक्षी जंगल में जाकर जीवित रह पाएँगे या नहीं, यह अपने आप में एक बड़ी चुनौती है। इसी उद्देश्य से रामदेवरा में लगभग 9.25 करोड़ रुपये की लागत से एक विशेष री-वाइल्डिंग एवियरी विकसित की गई। यह विशाल संरचना बंदी अवस्था में पले गोडावणों को धीरे-धीरे प्राकृतिक जीवन के अनुकूल बनाने के लिए तैयार की गई है। यहाँ पक्षियों को मानवीय संपर्क से यथासंभव दूर रखते हुए उड़ान, भोजन तलाशने और प्राकृतिक व्यवहार विकसित करने के अवसर दिए जाते हैं। जुलाई 2026 में पहली बार तीन गोडावण चूजों को इस री-वाइल्डिंग सुविधा में स्थानांतरित किया गया। यह संकेत था कि परियोजना अब केवल पक्षियों की संख्या बढ़ाने से आगे बढ़कर उन्हें प्राकृतिक जीवन के लिए तैयार करने के चरण में पहुँच चुकी है।अक्टूबर 2026 में इस परियोजना ने एक ऐतिहासिक पड़ाव पार किया, जब बंदी अवस्था में प्रजनन से तैयार किए गए दो नर गोडावणों को जैसलमेर के डेजर्ट नेशनल पार्क में जंगल में छोड़ा गया। यह घटना गोडावण संरक्षण की वर्षों लंबी यात्रा में एक महत्वपूर्ण क्षण है। लेकिन इसे अंतिम सफलता मानना अभी जल्दबाजी होगी। वास्तव में यह एक नई परीक्षा की शुरुआत है। अब वैज्ञानिकों को यह देखना होगा कि ये पक्षी जंगल में कैसे व्यवहार करते हैं, भोजन कैसे खोजते हैं, शिकारी से कैसे बचते हैं, बिजली की लाइनों और अन्य मानवीय खतरों से कैसे निपटते हैं और क्या वे भविष्य में प्राकृतिक प्रजनन में योगदान दे सकते हैं। यदि ये पक्षी सफलतापूर्वक जंगल में जीवित रहते हैं और आगे प्रजनन करते हैं, तभी संरक्षण-प्रजनन कार्यक्रम अपने वास्तविक उद्देश्य की ओर बढ़ता दिखाई देगा।वर्तमान स्थिति का आकलन करते समय एक महत्वपूर्ण अंतर समझना आवश्यक है। भारतीय वन्यजीव संस्थान के 2024-25 के वैज्ञानिक आकलन में राजस्थान में जंगली गोडावणों की संख्या लगभग 130 ± 21 आंकी गई। 2017-18 में यह अनुमान 128 ± 19 था। इसका अर्थ यह है कि जंगली आबादी में पिछले वर्षों के दौरान कोई बहुत बड़ी वृद्धि नहीं हुई है और वैज्ञानिक दृष्टि से इसे मोटे तौर पर स्थिर आबादी माना जा सकता है। दूसरी ओर, संरक्षण-प्रजनन केंद्रों में पक्षियों की संख्या बढ़ी है। अक्टूबर 2026 तक सम और रामदेवरा के संरक्षण केंद्रों में लगभग 97 गोडावण मौजूद थे। 2025 में बंदी प्रजनन से 24 जीवित चूजे और 2026 में 29 जीवित चूजे पैदा हुए। इस प्रकार संरक्षण केंद्रों में सफलता दिखाई दे रही है, लेकिन उसे जंगली आबादी में वृद्धि के बराबर नहीं माना जा सकता। यही अंतर इस पूरी परियोजना की अगली चुनौती को सामने लाता है—कैद में गोडावणों की संख्या बढ़ाना एक उपलब्धि है, लेकिन जंगल में उनकी स्थायी आबादी बढ़ाना अंतिम लक्ष्य है।
गोडावण के लिए सबसे गंभीर मानवीय खतरों में ऊँची बिजली की लाइनें शामिल हैं। भारी शरीर और अपेक्षाकृत धीमी उड़ान के कारण यह पक्षी बिजली के तारों से टकराने के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील है। थार के खुले परिदृश्य में बिछा बिजली का जाल उसके प्राकृतिक आवास को कई स्थानों पर जोखिमपूर्ण बना देता है। यही कारण है कि गोडावण संरक्षण की चर्चा में बिजली लाइनों का प्रश्न लगातार सामने आता रहा है। संवेदनशील क्षेत्रों में बिजली लाइनों को भूमिगत करना, उनके मार्ग में परिवर्तन करना और बर्ड फ्लाइट डाइवर्टर् लगाने जैसे उपायों पर जोर दिया गया है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी गोडावण के संरक्षण और बिजली की लाइनों से होने वाली मौतों के प्रश्न पर गंभीरता से विचार किया है। यह चुनौती इसलिए और महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि यदि संरक्षण केंद्रों में वर्षों की मेहनत से पैदा किए गए पक्षियों को जंगल में छोड़ा जाए और उनके प्राकृतिक आवास में वही खतरे मौजूद रहें, तो पूरा प्रयास जोखिम में पड़ सकता है।
गोडावण का संरक्षण केवल डेजर्ट नेशनल पार्क की सीमा तक सीमित नहीं किया जा सकता। इस पक्षी का वास्तविक घर खुले घास के मैदान, चरागाह, ओरण और रेगिस्तानी खुले क्षेत्र हैं। विडंबना यह है कि जिस भूमि को लंबे समय तक ‘बंजर’ या ‘अनुपयोगी’ समझा जाता रहा, वही भूमि गोडावण और अनेक दूसरे वन्यजीवों के लिए महत्वपूर्ण आवास है। भूमि उपयोग में परिवर्तन, सड़कें, ऊर्जा परियोजनाएँ, खनन, कृषि विस्तार और अन्य मानवीय गतिविधियाँ इन खुले क्षेत्रों को प्रभावित करती हैं। इसलिए गोडावण को बचाने का अर्थ केवल राष्ट्रीय उद्यान की सीमा की रक्षा करना नहीं है, बल्कि उसके आसपास के पूरे प्राकृतिक परिदृश्य को सुरक्षित रखना है। राजस्थान के पारंपरिक ओरण और चरागाह इस दृष्टि से विशेष महत्व रखते हैं।गोडावण संरक्षण में स्थानीय समाज की भूमिका भी निर्णायक होगी। थार का भू-दृश्य केवल वन विभाग या वन्यजीव वैज्ञानिकों का क्षेत्र नहीं है। यहाँ पीढ़ियों से ग्रामीण समुदाय रहते आए हैं और पशुपालन तथा अन्य आजीविकाएँ इस प्राकृतिक क्षेत्र का हिस्सा रही हैं। इसलिए संरक्षण को स्थानीय लोगों के विरुद्ध खड़ा करने के बजाय उन्हें उसका सहभागी बनाना अधिक प्रभावी रास्ता होगा। ग्रामीणों को संरक्षण की आर्थिक और सामाजिक उपयोगिता समझाने, स्थानीय स्तर पर निगरानी व्यवस्था विकसित करने, संरक्षण आधारित रोजगार और ईको-टूरिज्म की संभावनाओं को बढ़ाने तथा ओरण और घासभूमियों के महत्व को स्वीकार करने की आवश्यकता है। गोडावण का भविष्य केवल वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं में नहीं, बल्कि उस समाज के सहयोग पर भी निर्भर करेगा जिसके बीच यह पक्षी सदियों से रहा है।
गोडावण संरक्षण की इस यात्रा को राजनीतिक खेमों में बाँटना भी उचित नहीं होगा। वर्ष 2013 में राजस्थान में इस प्रोजेक्ट की शुरुआत हुई। 2018 में केंद्र सरकार, राजस्थान वन विभाग और भारतीय वन्यजीव संस्थान की साझेदारी से वैज्ञानिक संरक्षण-प्रजनन कार्यक्रम का आधार मजबूत हुआ। 2019 से 2023 के बीच सम और रामदेवरा में संरक्षण-प्रजनन की आधारभूत संरचना विकसित हुई और महत्वपूर्ण प्रजनन उपलब्धियाँ सामने आईं। 2024 के बाद कृत्रिम गर्भाधान, री-वाइल्डिंग और प्राकृतिक आवास में पुनःस्थापना जैसे अगले चरणों पर काम आगे बढ़ा।आज गोडावण संरक्षण के सामने एक ओर उत्साहजनक उपलब्धियाँ हैं और दूसरी ओर गंभीर चुनौतियाँ। सम और रामदेवरा के केंद्रों में संरक्षण आबादी का बढ़ना, बंदी प्रजनन से लगातार चूजों का जन्म, कृत्रिम गर्भाधान में सफलता, ‘जम्पस्टार्ट’ प्रयोग और री-वाइल्डिंग एवियरी का निर्माण वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण कदम हैं। लेकिन जंगल में गोडावणों की संख्या अभी भी लगभग 130 के आसपास है। इसलिए संरक्षण केंद्रों की सफलता को जंगली आबादी की वापसी मान लेना सही नहीं होगा। आने वाले वर्षों में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही रहेगा कि संरक्षण केंद्रों में जन्मे गोडावण जंगल में कितनी सफलता से जीवित रह पाते हैं और क्या वे प्राकृतिक रूप से प्रजनन करने में सक्षम होते हैं। यही वह चरण होगा जो इस पूरे अभियान की वास्तविक दिशा तय करेगा।
गोडावण की कहानी दरअसल हमारे पर्यावरण की कहानी भी है। जब घासभूमियाँ घटती हैं तो केवल एक पक्षी का घर नहीं जाता, बल्कि उसके साथ अनेक छोटे जीव-जंतु, कीट और वनस्पतियाँ प्रभावित होती हैं। जब बिजली की लाइनें पर्यावरणीय संवेदनशीलता के बिना प्राकृतिक क्षेत्रों से गुजरती हैं तो समस्या केवल गोडावण की नहीं रहती, बल्कि विकास और प्रकृति के बीच संतुलन का प्रश्न बन जाती है। जब ओरण और चरागाहों को केवल खाली या अनुपयोगी जमीन समझा जाता है, तब हम उस प्राकृतिक पूँजी को नष्ट करते हैं जिसकी कीमत किसी सरकारी बजट में दर्ज नहीं होती। इसलिए गोडावण को बचाना राजस्थान के रेगिस्तानी पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है। गोडावण संरक्षण की लगभग तेरह वर्ष की यात्रा अब एक निर्णायक मोड़ पर पहुँच चुकी है। 2013 में संरक्षण परियोजना की शुरुआत से लेकर 2018 की वैज्ञानिक साझेदारी, 2019 में संरक्षण-प्रजनन केंद्र की स्थापना, 2022 में रामदेवरा केंद्र के संचालन, 2023 में बंदी प्रजनन से प्राकृतिक प्रजनन की सफलता, 2024 में कृत्रिम गर्भाधान और 2026 में री-वाइल्डिंग तक यह अभियान लगातार नए चरणों में प्रवेश करता रहा है। अक्टूबर 2026 में दो बंदी-प्रजनित नर गोडावणों का जंगल में लौटना इस यात्रा का सबसे प्रतीकात्मक पड़ाव है। मगर असली मंजिल अभी दूर है। अब यह देखना होगा कि वे खुले रेगिस्तान में कितनी सफलता से जीवन जीते हैं और आने वाली पीढ़ियों को जन्म देने में कितनी भूमिका निभाते हैं। गोडावण को बचाने का अर्थ अंततः उसे संरक्षण केंद्र में सुरक्षित रखना नहीं, बल्कि उसे उस खुले आकाश में वापस स्थापित करना है, जहाँ से वह कभी राजस्थान की प्राकृतिक पहचान का हिस्सा बना था। जिस दिन थार के किसी खुले मैदान में गोडावणों का झुंड बिना किसी कृत्रिम सहारे के अपने स्वाभाविक जीवन में विचरण करता दिखाई देगा, उस दिन कहा जा सकेगा कि यह संरक्षण अभियान अपनी वास्तविक मंजिल तक पहुँचा है। अभी वह दिन भविष्य की उम्मीद है—लेकिन 2026 में खुले आकाश की ओर लौटे वे दो गोडावण उस उम्मीद को पहले से कहीं अधिक वास्तविक बना चुके हैं।###
स्वतंत पत्रकार
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