

राजस्थानी भाषा को मिले संवैधानिक सम्मान, सभी विश्वविद्यालयों में खोले जाएं विभाग
बीकानेर। राजस्थानी भाषा को उसका वाजिब अधिकार दिलाने की मांग एक बार फिर मुखर हुई है। राजस्थानी भाषा के समर्थकों का कहना है कि आजादी के बाद से ही करोड़ों लोग राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने तथा राजस्थान की दूसरी राजभाषा का दर्जा देने की मांग को लेकर निरंतर संघर्षरत हैं। नई शिक्षा नीति लागू होने के बाद से प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा राजस्थानी को शिक्षा का माध्यम बनाए जाने की मांग भी लगातार उठाई जा रही है। राजस्थानी भाषा की लगातार उपेक्षा को लेकर भाषा प्रेमियों, साहित्यकारों और विभिन्न सामाजिक संगठनों में रोष व्याप्त है। हाल ही में प्रदेश के सभी विश्वविद्यालयों में शास्त्रीय भाषा मराठी के अध्ययन केंद्र स्थापित करने के निर्देश जारी होने के बाद यह मुद्दा और अधिक चर्चा में आ गया है। इस संबंध में कमल रंगा ने कहा कि राजस्थानी भाषा के समर्थक सदैव सभी भारतीय भाषाओं का सम्मान करते आए हैं। यदि राजस्थान के विश्वविद्यालयों में किसी भी भारतीय भाषा के अध्ययन केंद्र खोले जाते हैं, तो उन्हें इससे कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन राजस्थान की अपनी समृद्ध भाषा राजस्थानी की उपेक्षा उचित नहीं है। उन्होंने प्रदेश के मुख्यमंत्री एवं उच्च शिक्षा मंत्री से आग्रह किया कि राजस्थान के सभी विश्वविद्यालयों में शीघ्र राजस्थानी भाषा के विभाग स्थापित किए जाएं, ताकि प्रदेश के करोड़ों राजस्थानी भाषी लोगों की जनभावनाओं, सांस्कृतिक विरासत और भाषाई अस्मिता का सम्मान सुनिश्चित हो सके। रंगा ने कहा कि राजस्थानी भाषा का समृद्ध साहित्य, लोक संस्कृति और ऐतिहासिक विरासत प्रदेश की पहचान है। ऐसे में इसके संरक्षण, संवर्धन और अकादमिक विकास के लिए विश्वविद्यालय स्तर पर राजस्थानी विभागों की स्थापना समय की आवश्यकता है। इससे नई पीढ़ी को अपनी मातृभाषा के अध्ययन, शोध और रोजगार के नए अवसर भी प्राप्त होंगे।
