

डॉ. छगन मोहता स्मृति व्याख्यानमाला की 23वीं कड़ी
बीकानेर। जनांदोलन राजनीति और राजनीतिक व्यवस्था की कमियों पर सवालिया निशान खड़े करते हुए उसे चुनौती देते हैं। ये आंदोलन सत्ता के दुरुपयोग एवं भ्रष्टाचारयुक्त औपचारिक राजनीति पर सवाल उठाते हैं और सभी जनांदोलनों के केंद्र में जनता ही होती है। यह विचार विचारक आदित्य निगम ने डॉ. छगन मोहता स्मृति व्याख्यानमाला की 23वीं कड़ी के तहत प्रौढ़ शिक्षा भवन सभागार में आयोजित ‘इक्कीसवीं सदी के जनांदोलनों के आईने में राजनीति और सियासत’ विषयक व्याख्यान में मुख्य वक्ता के रूप में व्यक्त किए। निगम ने देश-विदेश के विभिन्न जनांदोलनों की पृष्ठभूमि एवं प्रकृति पर चर्चा करते हुए स्थानीय संदर्भों को भी जोड़ा। उन्होंने कहा कि राजनीति जिस शै का नाम है, उसका वजूद ही द्वंद्व और अंतर्विरोध पर टिका है। अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. नंदकिशोर आचार्य ने कहा कि लोकतंत्र में किसी के भरोसे नहीं रहना है। अन्यायपूर्ण व्यवस्था एवं कानून का विरोध करना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। उन्होंने कहा कि हमें स्वयं को लोकतंत्र के योग्य बनाए रखना होगा, अन्यथा हमें वैसा ही लोकतंत्र मिलेगा, जिसके लिए हम स्वयं जिम्मेदार होंगे। डॉ. ओम कुवेरा ने डॉ. छगन मोहता के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि डॉ. छगन मोहता अपने आप में बेजोड़ एवं फक्कड़ व्यक्तित्व के धनी थे। उनके व्यक्तित्व में ज्ञान के प्रति किंचित मात्र भी अहंकार नहीं था। कार्यक्रम के खुले सत्र में संपत जैन, धर्मचंद्र जैन, मुकेश व्यास, मोतीलाल बोदानी, भवानी सोलंकी, शकूर बीकानेरी, बुलाकी शर्मा एवं जीतेन्द्र श्रीमाली सहित अन्य लोगों ने जनांदोलनों में नैतिकता, कानून की पेचीदगियों, विऔपनिवेशीकरण, जेपी आंदोलन तथा आरक्षण रिव्यू आंदोलन की संभावनाओं सहित विभिन्न विषयों पर अपनी जिज्ञासाएं एवं विचार रखे। डॉ. ब्रजरतन जोशी ने मुख्य वक्ता का परिचय देते हुए कहा कि आज का विषय राजनीति, इतिहास एवं दर्शन के संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक है। संस्था के कोषाध्यक्ष गिरिराज मोहता ने आगंतुकों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इस प्रकार के आयोजन आत्मबोध एवं सामाजिक चिंतन का अवसर प्रदान करते हैं।
