

नगर निकाय चुनावों में दलीय व्यवस्था को लेकर हो मंथन
बीकानेर। आम जागरूक मतदाता एवं लेखक बृज गोपाल जोशी ने नगर निकाय चुनावों की वर्तमान प्रक्रिया में बदलाव और दलीय व्यवस्था से जुड़े प्रावधानों पर गहन चिंतन की आवश्यकता जताई है। जोशी ने कहा कि उन्होंने अपने 70 वर्ष के जीवन में नगर निकाय के कई चुनाव देखे हैं और अपने मताधिकार का उपयोग किया है। उनके अनुसार पूर्व में नगरपालिका चुनावों में वार्ड प्रतिनिधियों का चयन पार्टी के चुनाव चिह्न के बजाय उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि, सामाजिक सरोकार और मोहल्ले में उसकी भागीदारी को ध्यान में रखकर किया जाता था। आजादी से पहले रियासत काल में भी वार्ड प्रतिनिधियों के चयन की अलग व्यवस्था होने की जानकारी मिलती है। उन्होंने कहा कि स्वतंत्र भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था के विकास के साथ वार्ड प्रतिनिधियों के लिए अलग-अलग चुनाव चिह्न निर्धारित किए जाने लगे। इसके बाद निर्वाचित पार्षदों द्वारा नगरपालिका के सभापति का चुनाव किया जाता था और सभापति लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के अनुरूप नगर विकास के लिए अपने दायित्वों का निर्वहन करते थे। जोशी ने कहा कि समय के साथ नगर निकाय चुनावों में पार्टी सिंबल का चलन बढ़ा है। ऐसे में नगर निकायों की चुनाव प्रक्रिया में भी देश के मूल लोकतांत्रिक ढांचे के अनुरूप दलीय व्यवस्था से संबंधित प्रावधानों पर विचार किया जाना चाहिए। उनके अनुसार इससे चुनावी खर्चों में कमी आने के साथ राजनीतिक चेतना को अधिक स्वच्छ, पारदर्शी और विकसित बनाने में मदद मिल सकती है।
उन्होंने हाल ही में प्रदेश में हुए नगर निकाय चुनावों का उल्लेख करते हुए कहा कि कुछ स्थानों पर किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत मिलने के बावजूद अल्पमत वाले पार्षदों के माध्यम से महापौर या अध्यक्ष निर्वाचित करवाने के प्रयास किए गए। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में राजनीतिक दलों की ओर से एक-दूसरे पर विभिन्न प्रकार के आरोप-प्रत्यारोप भी लगाए गए। कहीं-कहीं ऐसे प्रयास सफल नहीं हुए, लेकिन उनके अनुसार इस प्रकार की राजनीतिक गतिविधियां लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंतन का विषय हैं।
जोशी ने कहा कि बदलती परिस्थितियों में संवैधानिक संस्थाओं और राजनीतिक दलों को नगर निकाय चुनावों की प्रक्रिया को लेकर गहन चिंतन-मंथन करने की आवश्यकता है, ताकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतदाताओं के विश्वास को मजबूत किया जा सके।
