

पुस्तक समीक्षा
समीक्षक: उमाशंकर आचार्य
पुस्तक: बची हुई रोशनी में (काव्य-संग्रह)
कवि: गिरिराज मोहता
प्रकाशक: सोशल प्रोग्रेसिव सोसाइटी(2026)
गिरिराज मोहता का काव्य-संग्रह ‘बची हुई रोशनी में’ अपने समय, समाज और मनुष्य के भीतर झांकने वाली कविताओं का संग्रह है। इसकी कविताओं में जीवन के अनुभव किसी बड़े दार्शनिक आख्यान के रूप में नहीं, बल्कि रोजमर्रा के छोटे-छोटे प्रसंगों, रिश्तों, स्मृतियों और संवेदनाओं के माध्यम से सामने आते हैं। संग्रह का शीर्षक ही इसकी मूल संवेदना का संकेत देता है-अंधेरे के बीच उस रोशनी की तलाश, जो अभी पूरी तरह बुझी नहीं है। कवि की सबसे उल्लेखनीय विशेषता उनका सहज कथ्य और संक्षिप्त अभिव्यक्ति है; वे बहुत कम शब्दों में ऐसी बात कहते हैं, जिसके पीछे जीवन का लंबा अनुभव छिपा दिखाई देता है।
रिश्ते और मनुष्य इस संग्रह के केंद्र में हैं। ‘पिता’, ‘मां’, ‘रिश्तों की धूप में’, ‘हमसफर’, ‘इश्क’, ‘जुबां’ और ‘नहीं हूं’ जैसे शीर्षक निजी जीवन और संबंधों की जटिलताओं की ओर संकेत करते हैं। ‘पिता’ कविता में कवि पिता को केवल एक पारिवारिक संबोधन के रूप में नहीं, बल्कि अपने अनुभव और भावों के विस्तार से जोड़ते हैं-इस तरह निजी स्मृति सामूहिक अनुभव का रूप ले लेती है।
संग्रह की अनेक कविताएं आकार में छोटी हैं, पर उनका प्रभाव कहे और अनकहे के बीच बने अंतराल में है। ‘ठोकर’ कविता में ठोकर को जीवन के बड़े सबक के रूप में देखा गया है, तो ‘तजुर्बे’ किताबी और जीवन से प्राप्त अनुभव के अंतर को रेखांकित करती है।
कवि की दृष्टि निजी संबंधों तक सीमित नहीं रहती। ‘मिजाज’ में शहर के बदलते स्वभाव और व्यवस्था की ओर संकेत मिलता है, तो ‘लोकडाउन शृंखला की तीन कविताएं लौटने, ठहरने और बीते समय की सामूहिक मानसिकता को निजी संवेदना के स्तर पर पकड़ने का प्रयास करती है।
‘इश्क’ में कवि प्रेम को लेकर समाज की अलग-अलग धारणाओं को सामने रखते हैं जैसे कोई इसे जिंदगी कहता है, कोई मौत और इस तरह अलग अलग विद्वजन प्रेम की एक नहीं, अनेक परिभाषाओं की ओर संकेत करते हैं, वह भी साधारण बोलचाल की भाषा में। ‘जुबां’ और ‘नहीं हूं’ में आत्मसंवाद का स्वर है उदाहरण के लिए पहली में सच कहने का साहस, दूसरी में आत्मसम्मान और असहमति, जहां चुप्पी भी अर्थ ग्रहण कर लेती है।
भाषा की दृष्टि से संग्रह की सबसे बड़ी ताकत उसकी सहजता है-बोलचाल के निकट, संप्रेषणीय, बिना अनावश्यक अलंकार के। छोटे वाक्य, विराम और दोहराव की शैली कई कविताओं को गद्यात्मक सहजता के करीब ले जाती है, फिर भी कविता का भाव बनाए रखती है। ‘शहर’, ‘शोर’, ‘काफिला’, ‘सराय’ जैसे शीर्षक दिखाते हैं कि कवि की सामाजिक चेतना किसी घोषणापत्र की तरह नहीं, बल्कि रोजमर्रा के जीवन से होकर सामने आती है।
यह संग्रह लेखक ने अपने दादा डॉ. छगनलाल मोहता और पिता डॉ. श्रीलाल मोहता को समर्पित किया है।
‘बची हुई रोशनी में’ मूलतः मनुष्य और उसके अनुभवों की किताब है, जहां रोशनी केवल उजाले का प्रतीक नहीं, बल्कि रिश्तों, स्मृतियों, उम्मीद और जीवन के प्रति विश्वास की वह शेष बची हुई संभावना है, जिसे कवि अंधेरे के बीच पहचानना चाहता है। गिरिराज मोहता की कविताएं पाठक को चौंकाने के बजाय धीरे-धीरे अपने भीतर उतरने का अवसर देती हैं।यही इनकी शक्ति और इस काव्य-संग्रह की सार्थकता है।
