

पारंपरिक जल प्रबंधन में वैज्ञानिकता के साथ सामुदायिक सहभागिता भी निहित
बीकानेर। विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर आयोजित पारंपरिक जल प्रबंधन संवाद कार्यक्रम में वक्ताओं ने जल संरक्षण की पारंपरिक प्रणालियों की उपयोगिता और प्रासंगिकता पर विस्तार से विचार व्यक्त किए। मुख्य वक्ता ब्रजरतन जोशी ने कहा कि पारंपरिक जल प्रबंधन केवल जल संरक्षण की तकनीक नहीं है, बल्कि इसमें वैज्ञानिकता के साथ-साथ सामुदायिकता, सहभागिता, सामाजिकता और सामूहिक जीवन मूल्यों के संस्कार भी समाहित हैं। उन्होंने कहा कि पूर्वजों द्वारा विकसित जल संरक्षण प्रणालियां आज भी जल संकट के समाधान में अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकती हैं। विशिष्ट वक्ता रामप्रसाद हर्ष ने कहा कि पारंपरिक जल प्रबंधन में वर्षा जल संरक्षण का विशेष महत्व रहा है। उन्होंने स्थानीय स्तर पर जल कुंडों, टांकों और अन्य पारंपरिक संरचनाओं के माध्यम से वर्षा जल संग्रहण को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर बल दिया। डॉ. विभा बंसल ने कहा कि आधुनिक सुविधाओं के कारण जल सहजता से उपलब्ध हो रहा है, लेकिन इसके परिणामस्वरूप लोगों में जल के प्रति लापरवाही भी बढ़ी है। उन्होंने जल के विवेकपूर्ण उपयोग और संरक्षण के प्रति जागरूकता विकसित करने की आवश्यकता बताई।
कार्यक्रम के खुले सत्र में नितिन गोयल, विजयशंकर आचार्य सहित अन्य प्रतिभागियों ने भी अपने अनुभव साझा करते हुए पारंपरिक जल संसाधनों के संरक्षण एवं संवर्धन पर विचार रखे। वक्ताओं ने जल संकट से निपटने के लिए पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक तकनीक के समन्वय को समय की आवश्यकता बताया।
