

बिस्सों के चौक में भक्त पूरणमल की रम्मत के संवादों व कथानक का लोगों ने रात भर जागकर आनंद लिया
बीकानेर। बिस्सों के चौक में देवी आशापुरा नाट्य एवं कला ंसस्थान की ओर से उस्ताद रमणसा बिस्सा की ’’भक्त पूर्णमल’’ की रम्मत (लोकनाट्य) गुरुवार रात से शुरू होकर शुक्रवार सुबह तक चला। सैकड़ों लोगों ने रातभर जागकर रम्मत के संवादों व गीतों का आनंद लिया। रात आशापुरा के मंच के अवतरण के समय पूरा बिस्सों का चौक श्रद्धालुओं से खचाखच भरा था। लोग आशापुरा का जयकारा लगा रहे थे तथा ’’करो आशापुरा आनंद शहर बीकाणे में ’’ स्तुति के साथ स्वर मिलाकर श्रद्धा भक्ति प्रदशित कर रहे थे।
रम्मत के उस्ताद कृष्ण कुमार बिस्सा ने बताया कि रम्मत में कामदेव व ब्रह्मचर्य के प्रभाव, नारी के चरित्र, वृद्धावस्था के बावजूद लोगों में काम की लालसा पर विभिन्न राग व तर्जों के संवादों के माध्यम से कटाक्ष किया गया। दुखान्तिका का यह लोक नाट्य देव, संत-महात्माओं की कृपा से, सतीव्रता नारी के तप से सुखान्तिका मे ं बदल जाता है।
बिस्सा ने बताया रम्मत के कथानक के अनुसार हाथरस के मुरलीधर व नत्थाराम द्वारा लिखित इस लोकनाट्य में पंजाब के सियालकोट के वृद्ध राजा शंखपति , उतर प्रदेश के कुशम नगर में स्वयंवर में मछली का भेदन कर नवयुवती फूलन दे को विवाह कर ले जाते है। नव विवाहित युवती फूलन दे राजा शंखपति के पुत्र भक्त पूर्णमल पर आसक्त हो जाती है। वह बहाना बनाकर अपने महल में बुलवा लेती है तथा अपनी काम पिपाशा शांत करना चाहती है, लेकिन भक्त पूर्णमल के अनुनय विनय करता है ’’ तू माता में पुत्र हूं, सोच समझे मन माही, चढू पिता के सहज पर, पलट जमाने जाए’’ । नव विवाहिता फूलन दे उसके बाद भी जवानी के वासना से वशीभूत होकर पारिवारिक, सामाजिक रिश्तों को दर किनार कर भक्त पूर्णमल के साथ जोर जबरदस्ती कर उसकी कटार व फैंटा अपने पास रख लेती है तथा राजा शंखपति को बुलाकर भक्त पूर्णमल द्वारा जोर-जबरदस्ती की झूठी मनगढ़त कहानी बताकर उसे फांसी पर चढ़वा देती है। भक्त पूर्णमल की पार्थिव देह को लेकर उसकी माता अम्बादे जंगल में विलाप करती है, इसी दौरान गुरु गोरखनाथ व उनका शिष्य ओघड़ नाथ भक्त पूर्णमल को जिन्दा कर दते है। भक्त पूर्णमल सन्यासी बनकर परमात्म भक्ति करते है।
रम्मत की शुरुआत देवी आशापुरा के मंच के अवतरण से तथा उनकी देवळी में पूजा अर्चना व स्तुति हुई। लोकनाट्य में देवी अम्बिका व पंथवारी माता की स्तुति वंदना ’’अम्बिके, जय शिव प्यारी अम्बिके, मात हमारी अम्बिके। भगवान गणेश का स्मरण करते हुए टेर (रम्मत के संवाद ) सुनाते हुए स्तुति वंदना की । उसमेंं बिस्सा पुष्करणा ब्राह्मण परिवार के तपस्वी, वेदपाठी व तांत्रिक स्वर्गीय जागनाथ बिस्सा, उनके शिष्य हीरालाल व्यास रताणी, जीतमल सेवग व उस्ताद रमणसा बिस्सा आदि का स्मरण वंदन किया गया। महादेव की स्तुति ’’गागड़ दी गंग सोहे, शीश पे, पागड़दी पार्वतों के साथ, सांगड़ दी शिव शंकर नाम तो भागड़दी भंग पीवे नाथ’’’ भक्ति रचना प्रस्तुत की गई।
जोशी-जोशण व खाखी की भूमिका-देवी-देवताओं व रम्मत के उस्तादों के बाद जोशी जोशण तथा खाखी के पात्र भी दर्शकों के आकर्षण का केन्द्र रहते है। ’’जोशी-जोशण के पात्र अच्छे जमाने का संदेश दिया वहीं खाखी रम्मत के अखाड़े व कलाकारों को बुरी बलाओं व बुरी नजर से बचाने के लिए धूम मचाई। ’’ खाखी आयो धूम के कपड़ा धोवे साबू से’’
गुरुवार रात बारह बजे आशापुरा की स्तुति वंदना से शुरू हुई रम्मत का समापन शुक्रवार को सुबह करीब सवा दस बजे माता की स्तुति के बाद होता है। सभी कलाकार देवी आशापुरा की देवळी में कलाकारों ने नतमस्तक होकर उनसे प्रार्थना से किया।
रम्मत के पात्र-विशाल पुरोहित-देवी आशापुरा स्वरूप, कवि व सूत्रधार तथा हारमोनियम वादन-इंद्र कुमार बिस्सा, रानी अम्बादे-विकास पुरोहित, शंखपति-गोविंद गोपाल बिस्सा’, नव विवाहिता रानी फूलन दे-मनोज कुमार व्यास, बांदी-विष्णु दत बिस्सा, भक्त पूर्णमल कृष्ण कुमार बिस्सा, गुरु गोरखनाथ-महेन्द्र बिस्सा, औद्यड़नाथ का किरदार प्रेम गहलोत निभाएंगे। नगाड़े पर मनीष व्यास, संगत करेंगे। कार्यक्रम में सांवर लाल रंगा सहित अनेक कलाकारों ने लोकगीत प्रस्तुत किए। सह गायक रामकुमार बिस्साख् बल्लूजी बिस्सा, अविनाष, अनिकेत, रविन्द्र, देवेष, लूणाराम, विजय कुमार व्यास, डी.के.कल्ला, कमल कल्ला, पंडित योगेष बिस्सा, विष्णु बिस्सा, रुद्र पुरोहित, शिवम पुरोहित व भैरव रतन बिस्सा होंगे। जो संवादों की टेर भरेंगे। टेर बिना रम्मत ढेर हो जाती है इसलिए टेर भरने वाले कलाकारों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रहती है।
