

डॉ. प्रकाशदान चारण की राजस्थानी आलोचना कृति ‘नूंई कविता दीठ अर दरसाव’ का लोकार्पण
बीकानेर/जोधपुर। साहित्यिक आलोचना केवल किसी रचना के गुण-दोषों का विवेचन नहीं, बल्कि उसकी अंतर्वस्तु, संवेदना और वैचारिक पक्ष को समझने तथा व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने की सार्थक प्रक्रिया है। जिस प्रकार प्रकाश अंधकार को दूर कर वस्तुओं का वास्तविक स्वरूप सामने लाता है, उसी प्रकार सार्थक आलोचना साहित्यिक कृति की अंतर्निहित संवेदना, विचारधारा, शिल्प और जीवन-दृष्टि को उद्घाटित करती है। यह विचार डॉ. अर्जुनदेव चारण ने सूर्य प्रकाशन मंदिर के तत्वावधान में आयोजित डॉ. प्रकाशदान चारण की राजस्थानी आलोचना कृति ‘नूंई कविता दीठ अर दरसाव’ के लोकार्पण समारोह की अध्यक्षता करते हुए व्यक्त किए। डॉ. चारण ने कहा कि आलोचना वही सार्थक है, जो साहित्य को देखने की नई दृष्टि प्रदान करे और पाठक की चेतना को आलोकित करे। समारोह के संयोजक कुसुमलता चारण एवं डॉ. प्रशांत बिस्सा ने बताया कि कार्यक्रम में सारस्वत अतिथि के रूप में उपस्थित राजस्थानी के प्रतिष्ठित विद्वान डॉ. मदन सैनी ने कहा कि साहित्य का सृजन करना आसान है, लेकिन उसकी आलोचना करना कठिन कार्य है। मौलिक सृजन को आलोचना के माध्यम से व्यापकता और रचनात्मक विस्तार मिलता है। समारोह में विशिष्ट अतिथि के रूप में कवि एवं आलोचक डॉ. गजेसिंह राजपुरोहित उपस्थित रहे। इस अवसर पर आशीष पुरोहित ने पत्रवाचन किया। कार्यक्रम में सोहनदान चारण, कौशलनाथ उपाध्याय सहित साहित्यप्रेमी एवं प्रबुद्धजन उपस्थित रहे।
