

साधार्मिक भक्ति, जैन धर्म में एक महत्वपूर्ण अवधारणा
बीकानेर। गच्छाधिपति आचार्य प्रवर श्री जिनमणि प्रभ सूरीश्वरजी महाराज के आज्ञानुवर्ती गणिवर्य श्री मेहुल प्रभ सागर म.सा.,ने गुरुवार को वर्षात के कारण डागा, सेठिया व पारख मोहल्ले के महावीर भवन में प्रवचन किए। सुबह साढ़े आठ बजे से साढ़े दस बजे तक वर्षात नहीं होने पर नियमित प्रवचन ढढ्ढा कोटड़ी में होंगे।
श्री सुगनजी महाराज का उपासरा ट्रस्ट, अखिल भारतीय खरतरगच्छ युवा परिषद की बीकानेर इकाई की ओर से सकल श्रीसंघ के सहयोग से आयोजित चातुर्मास में गणिवर्य मेहुलप्रभ सागर म.सा. ने कहा कि जिन शासन, देव, गुरु व परमात्म भक्ति तथा धार्मिक आचरण से धर्म टिकता है। उन्होंने कहा कि साधार्मिक भक्ति, जैन धर्म में एक महत्वपूर्ण अवधारणा है। जैन धर्म में साधर्मिक भक्ति को बहुत महत्व दिया गया है। साधर्मिक भक्ति का तात्पर्य है अपने साथी,समुदाय के लोगों की भक्ति व सेवा करना है।
