

कैया करे हवा रौ रूख समझ लेवै बो मिनख…
बीकानेर
प्रज्ञालय संस्थान एवं राजस्थानी युवा लेखक संघ द्वारा अपनी मासिक साहित्यिक नवाचार के तहत प्रकृति पर केन्द्रित ‘काव्य रंगत-शब्द संगत‘ की दसवीं कड़ी लक्ष्मीनारायण रंगा सृजन सदन नत्थूसर गेट बाहर संपन्न हुई।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार कमल रंगा ने कहा कि प्रकृति और कविता का संबंध अत्यंत घनिष्ठ है। प्रकृति अपने विभिन्न रूपात्मक विराट प्रसार को लेकर मनुष्य के ह्रदय पर अनेक संस्कार डाला करती है, जिससे प्राकृतिक सौन्दर्य के प्रति मनुष्य का सहज आकर्षण हो जाता है, उसकी अभिव्यक्ति साहित्य में प्रकृति के संश्लिष्ट चित्रण का निरूपण करके की जाती है।
रंगा ने आगे कहा कि आज की दसवीं कडी मंे विशेष आमंत्रित कवि-शायरों ने प्रकृति के नैसर्गिक स्वभाव को ’हवा’ के विभिन्न पक्षों को उकेरते हुए काव्य रस धारा से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।

काव्य पाठ करते हुए कमल रंगा ने अपनी कविता-कैया करे हवा रौ रूख समझ लेवै बो मिनख/पण म्हैं नीं मानूं/असल में हवा रौ रूख बदल देवै बो हुवै मिनख….प्रस्तुत कर हवा का मानवीयकरण करते हुए नए संदर्भ एवं नव बोध के साथ कविता प्रस्तुत कीं
इस महत्वपूर्ण काव्य संगत में श्रीमती इन्द्रा व्यास, डॉ गौरीशंकर प्रजापत, क़ासिम बीकानेरी, कैलाश टाक, बाबूलाल छंगाणी ‘बमचकरी’, डॉ. नृसिंह बिन्नाणी, यशस्वी हर्ष, गिरिराज पारीक, इंजि. ऋषि कुमार तंवर, हरिकिशन व्यास ने अपनी हवा पर केन्द्रित गीत, कविता, गजल, हाइकू एवं दोहों से सरोबार इस काव्य रंगत में शब्द की शानदार संगत करी।
काव्य रंगत में वरिष्ठ कवियत्री श्रीमती इन्द्रा व्यास ने-वायु तु ना बिगाड़े स्वरूप थांरौ…. पेश कर हवा के रूप-स्वरूप को रेखांकित किया। वरिष्ठ शायर क़ासिम बीकानेरी ने-अपने शेर झुम कर प्यारे तराने/जब सुनाती है हवा…..सुनाकर हवा की रंगत को रखा। वरिष्ठ कवि कैलाश टाक ने-मैं हवा हूं/जैसा तू चलाएगा….. प्रस्तुत कर हवा और मनुष्य के रिश्तों को रेखांकित किया तो वरिष्ठ हास्य कवि बाबूलाल छंगाणी ने-जब तक यह है/तब तक ही दम है….. के माध्यम से हवा के महत्व को उकेरा।
कार्यक्रम का संचालन करते हुए वरिष्ठ हास्य कवि बाबूलाल छंगाणी ने बताया की अगली ग्यारहवीं कड़ी मार्च माह में ‘आग’ पर केन्द्रित होगी। आभारआशीष रंगा ने ज्ञापित किया।
