

अब तो पक्की है राजस्थानी भाषा को मान्यता, विदेशी धरती पर प्रधानमंत्री जी का राजस्थानी स्वागत-सत्कार
(राजेन्द्र जोशी) राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता दिए जाने का मन जापान की धरती पर प्रधानमंत्री जी ने बना लिया होगा। राजस्थानी संस्कृति एवं भाषा की झलक पिछले दिनों प्रधानमंत्री जी कि जापान यात्रा के दौरान खुद उन्होंने देखी। प्रधानमंत्री जी के स्वागत के दौरान स्थानीय कलाकारों ने प्रधानमंत्री जी के सामने, प्रधानमंत्री जी के आग्रह पर जब प्रस्तुति दी तो संभवत हमारे प्रधानमंत्री जी को यह अहसास हो गया होगा कि भारतीय भाषाओं में राजस्थानी भाषा का फलक कितना बड़ा है। राजस्थानी भाषा दुनिया के लगभग सभी देशों में बोली और समझी जाने के अतिरिक्त वहां की संस्कृति में स्थान बना चुकी है।आधुनिक काल में राजस्थानी भाषा- संस्कृति की गूंज सीमाओं के पार सुनाई और स्पष्ट दिखाई देती हैं।राजस्थानी भाषा के लिए हमारा वह दावा उस समय सच साबित हो गया। दुनिया-भर में बोली जाने वाली, लिखी जाने वाली और समझने वाली राजस्थानी भाषा को लगभग 12 करोड लोग बोलते हैं। जिसे प्रधानमंत्री जी ने अपने स्वागत के दौरान खुद देख लिया। संविधान की आठवीं अनुसूची में राजस्थानी भाषा को शामिल करने के लिए अब प्रधानमंत्री जी को किसी फाइल अथवा साक्ष्य की जरूरत नहीं होनी चाहिए। विदेशी धरती पर जापानी कलाकारों ने जब स्वागत प्रारंभ किया और कलाकारों ने खुद को राजस्थानी मधु के नाम से परिचित कराया। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्वागत किया तब प्रधानमंत्री जी ने खुद उनसे पूछा कि क्या आप गा सकती हैं तो उन्होंने यह कहा कि हम राजस्थानी लोकगीत सुना सकते हैं, तो स्थानीय कलाकारो ने राजस्थानी लोक गीत सुनाया।
भक्ति रस से डुबे जब प्रधानमंत्री जी के कानों में यह सुनाई दिया की म्हारा सतगुरु आंगन आया रे मैं वारी जाऊं रे राजस्थानी परंपरा में मेहमान कि भगवान से तुलना को जीवंत किया। यह गीत राजस्थान में इस गीत के माध्यम से अतिथि के घर आने से उन्हें देव तुल्य मानकर स्वागत सत्कार किया जाता है। और इस भावना को इस गीत में जापान की भूमि पर स्थानीय कलाकारों ने प्रधानमंत्री जी के स्वागत में गाया।
सात समंदर पार भी मीठी और अपनत्व की राजस्थानी भाषा भारत का डंका बजा रही है । उन जापानी कलाकारों को जब यह पता चलेगा कि जिस भाषा को हम बोल रहे हैं, उन लोकगीतों के माध्यम से हम आय अर्जित करते हैं उस भाषा को भारत में भी मान्यता नहीं है।
सच तो यह है की राजस्थान में कभी राज – काज की भाषा भी राजस्थानी रही है। आजादी के समय राजस्थानी भाषा ने अपना बलिदान देकर हिंदी के हित की बात की थी। भाषाएं लुप्त ना हो, भाषाएं लुप्त होती है तो संस्कृति बिगड़ जाती है। राजस्थानी भाषा और संस्कृति बहुत ही समर्थ भाषा रही है और आज भी हैं। राजस्थान के लगभग सभी विश्वविद्यालयों और सैकड़ो विद्यालयों में राजस्थानी पढ़ाई जाती हैं। दुनिया के अनेक विश्वविद्यालयों में राजस्थानी भाषा पढ़ाई जाती है। हिंदुस्तान के प्रत्येक राज्य और हर जिले में राजस्थानी बोलने वाला परिवार मिल जाएगा। राजस्थानी अब क्षेत्र विशेष की भाषा नहीं रही बल्कि पूरे हिंदुस्तान के साथ-साथ अब तो विश्व के प्रत्येक देश में आपका स्वागत सत्कार के लिए तैयार खड़ी है। मैं एक बार फिर प्रधानमंत्री जी से आग्रह करूंगा की राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने हेतु अध्यादेश जारी करावे ।
मैं प्रधानमंत्री जी से आग्रह करता हूं कि आपको भ्रम में रखा जा रहा है और यह मिथ्या बात फैलाई जाती है कि राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता से हिंदी कमजोर होगी एवं अन्य प्रांतीय भाषाओं को मान्यता मिल जाती है तो हिंदी कमजोर होती जाएगी। जबकि आपने जापान में जो देखा , जापानी कलाकारों ने राजस्थानी भाषा और संस्कृति को कितना समद्ध किया है। राजस्थानी भाषा को मान्यता मिलती है तो हिंदी मजबूत होगी। प्रधानमंत्री जी देश-विदेश में करोड़ों लोग राजस्थानी को प्यार करते हैं । विदेशी धरती पर भी आपने देख लिया सुन लिया मुझे लगता है कि अब जाचने परखने की कतई जरूरत नहीं है, राजस्थानी जैसी जुनी भाषा को मान्यता नहीं देने का कोई तर्कसंगत मुद्दा सरकार या अन्य भाषाओं की वकालत करने वालों के पास बचा नहीं है। राजस्थानी भाषा हजार वर्ष से भी अधिक प्राचीन है। देश को आजादी दिलाने में राजस्थानी भाषा के रचनाकारो का महत्वपूर्ण योगदान रेखांकित किया गया है।
1857 की क्रांति में राजस्थानी कवियों ने अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया था। हम बात करें तो मरुस्थल के कवि शंकरदान सामौर ने राजस्थानी रचनाओं के माध्यम से अंग्रेजों को खुली चुनौती दी थी। ऐसे अनेक रचनाकार हुए हैं जिन्होंने आजादी की लड़ाई में राजस्थानी कविताओं, गीतों और राजस्थानी भाषा के दोहो के माध्यम से आजादी की लड़ाई में अद्वितीय योगदान दिया था। भारत को आजाद कराने में राजस्थानी भाषा के महत्वपूर्ण योगदान को भुलाया नहीं जा सकता।
देश को अंग्रेजी शासन से मुक्त कराने हेतु शंकर दान सामौर जैसे क्रांतिकारी कवि सामौर 1857 में तन- मन- धन से शामिल होते हुए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। युवा राजस्थानी कवि इस संघर्ष को वह पूरी तरह समझने लगे थे। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान 1857 में उन्होंने कहा था कि यह अवसर बहुत महत्वपूर्ण है, देशवासियों को संबोधित करते हुए सामौर कहा कि यह अवसर छूट न जाए। भारत की आजादी के लिए अगर यह मौका छूट गया तो फिर से इस आंदोलन को खड़ा करना उतना ही मुश्किल होगा जैसे एक बार हिरण कूदने से छूट जाता है फिर संतुलन वापस नहीं आ सकता। उन्होंने लिखा थारू
आयौ औसर आज, गरब गौरां रौ गाळण
आयौ औसर आज, रीत राखण हिंदवाणी
आयौ औसर आज, विकट रण खाग बजाणी
फाळ हिरण चूक्यां फटक, पाछौ फाळ न पावसी
आजाद हिन्द करवा अवर, औसर इस्यौ न आवसी।
राजस्थानी भाषा का विपुल साहित्य है और इसका अपना शब्दकोश और विपुल मात्रा में समर्थ परंपरा के अनेक उदाहरण राजस्थानी भाषा की परंपरा में मिलेंगे।
-शिक्षाविद-साहित्यकार
9829032181
