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कबीरा सोई पीर है जमीन से जुड़ा और चेतना को झकझोरने वाला

कबीरा सोई पीर है जमीन से जुड़ा और चेतना को झकझोरने वाला है
बीकानेर। प्रज्ञालय संस्थान एवं राजस्थानी युवा लेखक संघ द्वारा अपने गत साढ़े चार दशकों की सृजनात्मक एवं रचनात्मक यात्रा में नव पहल व नवाचार के तहत इस बार पुस्तकालोचन कार्यक्रम जो कि पुस्तक संस्कृति एवं आलोचना विधा को समर्पित है, जिसकी पांचवीं कड़ी रंगा सृजन सदन में हिन्दी-राजस्थानी के कथाकार-उपन्यासकार एवं  नगेन्द्र किराड़ू के राजस्थानी उपन्यास ‘कबीरा सोई पीर है’ पर आयोजित हुई। पुस्तकालोचन कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कमल रंगा ने कहा कि नगेन्द्र किराड़ू का उपन्यास नारी विमर्श एवं मनोविज्ञान का तलपट है। जिसके माध्यम से नारी अस्मिता और उसके जीवन के विभिन्न संघर्ष के आयामों को रेखांकित करते हुए किराडू़ अपने बोल्ड कथ को अपने अंदाज से अनूठे शिल्प में ढालते हुए पाठक से एक रागात्मक रिश्ता बनाते है। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि वरिष्ठ आलोचक एवं शिक्षाविदड्ढ् डॉ. उमाकान्त गुप्त ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि ‘कबीरा सोई पीर है’ उपन्यास जमीन से जुड़ा है, और चेतना को झकझोरता है। स्त्री विमर्श की दिशा को खोलते हुए पात्रों में राजस्थानी की मूल चेतना को सशक्त शब्द देता है। यही इस उपन्यास एवं राजस्थानी उपन्यास यात्रा का सार्थक एवं सामर्थ्य का प्रमाण भी है। अशोक व्यास ने कहा कि इस उपन्यास के माध्यम से महिलाओं के प्रति विद्रुपता एवं विसंगतियों का मनोवैज्ञानिक विश्लेषणात्मक विवरण किया गया है।
इस मौके पर राजाराम स्वर्णकार, आत्माराम भाटी नगेन्द्र किराड़ू जुगलकिशोर पुरोहित बुलाकी शर्मा, प्रमोद शर्मा, डॉ. अजय जोशी, ज़ाकिर अदीब, राजेश रंगा, बी.एल. नवीन, महेन्द्र हर्ष, इसरार हसन कादरी, डॉ. गौरीशंकर प्रजापत, इरशाद अज़ीज़, गिरिराज पारीक, मदन जैरी, प्रेम नारायण व्यास, पुनीत पाण्डिया, कृष्ण चन्द्र पुरोहित, डॉ. नृसिंह बिन्नाणी, योगेन्द्र कुमार पुरोहित, नंदनी श्रीमाली, डॉ. फारूक चौहान, आशीष रंगा, जुगलकिशोर पुरोहित, भवानी सिंह राठौड़, हरिनारायण आचार्य, तोलाराम सारण एवं अख्तर अली आदि की गरिमामय सहभागिता रही।

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