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अनुवाद कर्म सृजनात्मक चुनौती: ‘अनगिनत अंबाएँ’ पुस्तक का लोकार्पण

अनुवाद कर्म सृजनात्मक चुनौती: ‘अनगिनत अंबाएँ’ पुस्तक का लोकार्पण
बीकानेर। प्रज्ञालय संस्थान द्वारा आयोजित लोकार्पण समारोह में साहित्यकार कमल रंगा की राजस्थानी पुरस्कृत नाट्य कृति ‘अलेखूं अंबा’ के हिन्दी अनुवाद ‘अनगिनत अंबाएँ’ का लोकार्पण साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित पुस्तक के रूप में सुदर्शन कला दीर्घा में किया गया। समारोह की अध्यक्षता करते हुए साहित्यकार मधु आचार्य ने कहा कि ‘अनगिनत अंबाएँ’ राजस्थानी का उत्तर आधुनिक साहित्यिक नाटक है और इसका मूल कृति से हिन्दी में श्रेष्ठ अनुवाद होना एक अनुपम उदाहरण है। कृति के अनुवादक वरिष्ठ साहित्यकार-आलोचक मालचंद तिवाड़ी ने कहा कि अनुवाद कर्म प्रेम का सृजनात्मक परिश्रम है, लेकिन इसे अक्सर दोयम दर्जे का लेखन मान लिया जाता है। जबकि इसकी चुनौती मौलिक सृजन से भी अधिक कठिन और जोखिमपूर्ण होती है। एक भाषा के अर्थ और अभिप्राय को दूसरी भाषा में उसकी मूल भावना को अक्षुण्ण रखते हुए प्रस्तुत करना सहज कार्य नहीं है। इस अवसर पर शंकरसिंह राजपुरोहित, विप्लव व्यास, गिरिराज पारीक, सरल विशारद, दीपचंद सांखला, नंदकिशोर सोलंकी, हरिशंकर आचार्य, रवि पुरोहित, राजेश रंगा, कृष्णचंद पुरोहित, डॉ. चंचला पाठक, शरद केवलिया, दयानंद शर्मा, अविनाश व्यास, राजेन्द्र जोशी, ज़ाकिर अदीब, डॉ. नमामि शंकर आचार्य एवं इन्द्रा व्यास सहित कई साहित्य प्रेमी उपस्थित रहे।

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