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राजस्थानी भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग को लेकर 21 फरवरी को धरना

राजस्थानी भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग को लेकर 21 फरवरी को धरना
बीकानेर। राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने तथा राजभाषा का दर्जा दिलाने की मांग को लेकर राजस्थानी मोट्यार परिषद, बीकानेर द्वारा 21 फरवरी को विश्व मातृ भाषा दिवस के अवसर पर एक दिवसीय धरना आयोजित किया जाएगा। इसके संबंध में परिषद द्वारा एक आम प्रेस वार्ता का आयोजन किया गया, जिसमें संयोजकों ने राजस्थानी भाषा के महत्व और उसके ऐतिहासिक योगदान पर प्रकाश डाला। प्रेस वार्ता में बताया गया कि राजस्थानी भाषा अत्यंत समृद्ध और प्राचीन भाषा है। इसका प्रथम ग्रंथ कुवलयमाला है, जिसके रचयिता उद्योतन सूरी थे। यह ग्रंथ आठवीं शताब्दी में रचा गया था, जो राजस्थानी भाषा की प्राचीनता और साहित्यिक परंपरा का प्रमाण है। वरिष्ठ साहित्यकार राजेन्द्र जोशी ने बताया कि राजस्थानी भाषा को मान्यता दिलाने का आंदोलन वर्ष 1944 से निरंतर चल रहा है, लेकिन अब तक इस दिशा में कोई ठोस कार्यवाही नहीं हुई है। उन्होंने कहा कि भाषा की समृद्ध परंपरा के बावजूद इसे संवैधानिक मान्यता नहीं मिलना चिंताजनक है।
इस अवसर पर डॉ. गौरीशंकर प्रजापत ने बताया कि वर्तमान में लगभग 100 विद्यालयों तथा 5 विश्वविद्यालयों में राजस्थानी भाषा का अध्ययन कराया जा रहा है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा भी राजस्थानी भाषा को मान्यता प्रदान की गई है, वहीं साहित्य अकादमी प्रतिवर्ष राजस्थानी भाषा के लिए पुरस्कार घोषित करती है। इसके बावजूद सरकार द्वारा भाषा को संवैधानिक दर्जा देने की दिशा में सकारात्मक पहल नहीं की जा रही है। प्रेस वार्ता में डॉ. नमामि शंकर आचार्य, डॉ. हरिराम विश्नोई, रामअवतार उपाध्याय, राजेश चौधरी और हिमांशु टाक सहित अन्य वक्ताओं ने भी राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता दिलाने की आवश्यकता पर जोर दिया।
इस अवसर पर परिषद के प्रदेश महासचिव प्रशांत जैन, मदनदान दासौड़ी, कमल मारू, शुभकरण उपाध्याय, दिलीप सेन, बजरंग बिश्नोई, नखतु चंद, पप्पू सिंह सहित अनेक सदस्य उपस्थित रहे।

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